प्रेमचन्द साहित्य संस्थान
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“केदार सम्‍मान समारोह”

 

केदार सम्मान समारोह

साहित्यिक पत्रिका “साखी ” द्वारा दिनाँक- 16 अप्रैल, 2022, दिन -शनिवार,  को बनारस में  गंगा के मनोरम घाट पर स्थित भव्य संत रैदास मंदिर, राजघाट के सभागार में केदारनाथसिंह कविता  सम्मान समारोह” का आयोजन सम्‍पन्‍न हुआ ।

इस समारोह में,  सम्मान(वर्ष 2021) के लिए कवियों के चयन हेतु पांच सदस्यीय चयन समिति  गठित की गयी थी। श्री ए अरविंदाक्षन(संयोजक) श्री चन्द्रकांत पाटिल, श्री राजेश जोशी, श्री अरुण कमल तथा सुश्री अनामिका  इस समिति का सदस्य नामित किए गए थे। समिति के निर्णयानुसार हिन्दी में श्री अंचित को उनके कविता संग्रह ‘शहर पढ़ते हुए’ (2019) एवं भारतीय भाषाओं से  मराठी कवि संदीप जगदाले को उनके संग्रह ‘असो आता चाड’ (2019) के लिए सम्‍मानित किया गया ।

 

कार्यक्रम में श्री सितांशु यशश्चन्द्र ( प्रख्यात गुजराती कवि,मुख्य अतिथि) श्री चन्द्रकांत पाटिल(सुप्रसिद्ध मराठी लेखक), श्री ए अरविंदाक्षन, श्री अरुण कमल ,सुश्री अनामिका, श्री मदन कश्यप, श्री उपेन्द्र कुमार, श्री स्वप्निल श्रीवास्तव, श्री पंकज चतुर्वेदी,श्री सुभाष राय, श्री नरेन्द्र पुंडरीक, श्री निशांत, श्री बलभद्र, सुश्री रंजीता सिंह, श्री बृजराज कुमार सिंह (सभी हिंदी कवि) सुश्री  संध्या सिंह , सुश्री रचना सिंह, श्री कपिलदेव, श्री संतोष भदौरिया, श्री सूर्य नारायण, श्री रामजी तिवारी, श्री कामेश्वर सिंह, श्री कमल कुमार, श्री राकेश कुमार रंजन, श्री निरंजन कुमार (सभी हिन्दी लेखक/ प्राध्यापक) सहित देश के अन्यान्य हिस्से से अनेक कवि लेखक मौजूद थे।

 

आमंत्रित लेखक रचनाकारों को अस्सी से राजघाट तक ले जाने के लिए, नावों की व्यवस्था की गयी थी। चिलचिलाती धुप में भी उनका उत्साह दर्शनीय था।  बनारस के घाटों से गुजरते हुए सभी कार्यक्रम स्थल पहुंचे जहाँ सुसज्जित भव्य रैदास मंदिर उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।  सभागार की दीवारों पर चस्पा केदार जी की रचनाओं के  हस्तनिर्मित पोस्टर एवं केदार जी के जीवन से जुड़े छायाचित्र केदार जी की उपस्थिति का एहसास करा रहे थे।  माननीय उपराष्ट्रपति जी का भी वाराणसी में कार्यक्रम होने के कारण आवागमन में बाधा रही परन्तु सभागार साहित्यप्रेमियों से भरा रहा ।

प्रथम सत्र में कार्यक्रम का सञ्चालन कर रहे प्रोफेसर समीर कुमार पाठक ने अष्टभुजा शुक्ल की इस कविता के पाठ के माध्‍यम से बनारस का परिचय देते हुए कार्यक्रम की नींव रखी-

ठगों से ठगड़ी में

संतों से सधुक्कड़ी में

लोहे से पानी में

अँग्रेज़ों से अँग्रेज़ी में

पंडितों से संस्कृत में

बौद्धों से पालि में

पंडों से पंडई और गुंडों से गुंडई में

और निवासियों से भोजपुरी में

बतियाता हुआ यह बहुभाषाभाषी बनारस है

कार्यक्रम के संयोजक प्रोफेसर सदानंद शाही जी ने औपचारिक स्वागत वक्तव्य में कहा कि केदार जी भले ही हिंदी के कवि हों, पर उनका व्यक्तित्व समूचे भारतीय कविता में खिलता एवं उभरता है। भारतीय भाषाओँ का प्रतिनिधित्व कर रहे सभी उपस्थित साहित्यकारों का आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि  ” साहित्यकार का हमेशा दो परिवार होता है, एक जो उनकी रचनाओं के माध्यम से उनसे जुड़ता है, और दूसरा परिवार जो उनके साथ जन्म-जन्मांतर का सम्बन्ध बांधे रहता है। इस कार्यक्रम में उनके दोनों ही परिवार मौज़ूद हैं”।  वाराणसी के  रैदास मंदिर में इस समारोह को आयोजित करने का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि रैदास और कबीर हिंदी कविता के नींव से जुड़ते हैं, और रही बात गंगा और बनारस की तो इनके बिना केदार जी की कविता बन नहीं पाती, अगरचे बन भी जाये तो समझने के लिए यहाँ की परम्परा से जुड़ना अत्यावश्यक है। उन्होंने केदार जी से जुड़े अपने संस्मरण साझा करते हुए उनकी स्मृतियों को जीवंत कर दिया । शाही जी ने कहा कि ” रैदास  की

बेगमपुरा वही वैकल्पिक  दुनिया है जिसे केदार जी अपनी कविता में हाथ की तरह नर्म, कोमल दुनिया कहते हैं।”

सम्‍मान सत्र में बोलते हुए तेलगू के कवि एवं आई. जी. वाराणसी श्री के. सत्यनारायण ने कहा कि केदार जी की कविता भाषा की सीमाओं से परे  है। अपने कथन के प्रमाण में उन्‍होनें बताया कि  केदार जी की कविता आपको अपनी ओर खींचती है, और-और  पढ़ने को प्रेरित करती  है। केदार जी की सख्सियत की प्रसंशा करते हुए उन्‍होनें कहा कि महाकवि वही हो सकता है  जो व्यक्तित्व का धनी हो, जिसकी कविताओं में संस्कृति की झलक हो  और केदार जी के पास वह है, वे आपको सोचने पर मजबूर कर देते हैं।

इसके बाद मराठी कवि संदीप जगदाले जी को केदारनाथ सिंह सम्मान से पुरस्कृत किया  गया । मंच पर काव्य पाठ्य के पूर्व अपने संक्षिप्‍त वक्‍तव्‍य में पुरस्‍कार के लिए हर्ष और आभार व्यक्त करते हुए उन्‍होंने कहा  कि  इस  सम्मान का मिलना मेरे लिए एक अविस्मरणीय सुखद घटना है। इसकी महत्ता इसलिए भी विशेष रूप से बढ़ जाती है की यह एक मराठी कवि को दिया जा रहा है ।  अपनी मातृभाषा के सभी कवियों के तरफ से मैं यह सम्मान स्वीकार करता हूँ ।  केदार जी की कविता मुझे मेरे गांव , मेरी मिटटी की , मेरे गांव के सुख दुःख की कविता लगती  है। केदार जी की कविता जितनी गंगा की है उतनी ही गोदावरी की भी है , जितनी  हिंदी की है उतनी अन्य भाषाओँ की भी है … उनकी कविता हमें समृद्ध मनुष्य भी बनाती है।  आगे उन्होंने अपने वक्तव्य में महाविकास का ग्रास बने स्‍वयं अपने गांव और उन गाँवों की पीड़ा का विस्‍तार से वर्णन किया, जो बांधों के नींव में बलि चढ़ गए ।  गाँव के भूमंडलीय परिवेश का जिक्र करते हुए उन्‍होनें श्रोताओं को गाँव के इतिहास से भी मुखातिब करवाया और बताया कि विकास के स्वप्न दिखाकर ग्राम्य जीवन को कैसे तहस-नहस किया गया।  उन्‍होंने पीडा से भीगी आवाज में कहा कि “गाँव के डूबने पर केवल एक गाँव नहीं डूबता, सिर्फ़ लोग नहीं डूबते, डूब जाती है।  एक पूरी संस्कृति, उस गाँव की भाषा, लोकोक्तियाँ और मुहावरे भी डूब जाते हैं जो फिर किसी विकास की रेल पर बैठकर वापस नहीं आते । कोई भी कवि सदैव एक अच्छी दुनिया का स्वप्न देखता है, और यह स्वप्न केवल और केवल कविता के सच्चे रूप से ही साकार हो सकता है । यह सच्चा स्वरूप हमें चक्रधर और तुकाराम की कविताओं में स्पष्ट परिलक्षित होता है।” सम्मान ग्रहण करते समय केदार जी की कविताओं को याद करते  हुए उन्होंने कहा कि  “केदारनाथ जी की कविताओं में स्थान एवं समय की सीमाएँ टूट जाती है । मैं अपने समकालीन कवियों के सम्मान में यह पुरस्कार स्वीकार करता हूँ।” इसके बाद उन्होंने अपनी मराठी कविताओं, मेरा गांव पानी में बसता है, धनुषकोडी, नदी ने खूँटा गाड़ दिया है मेरे पैरों पर, का सुमिता डागर द्वारा किया गया हिंदी अनुवादित का पाठ किया ।

प्रसिद्ध साहित्यकार अरुण कमल जी नें रैदास की प्रसिद्ध पक्तियों- “ज्ञानगंगा में समुज्‍वल चर्मकार/ चरण छूकर कर रहा मैं नमस्‍कार” के साथ अपने वक्‍तव्‍य का आरम्‍भ करते हुए कहा कि कवियों की कोई जमीन नहीं होती अपितु उनके पास समुद्र होता है। केदारजी के स्वभाव पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वे सहज एवं संवेदनशील कवि थे। उन्होंने कभी भी नए कवियों से मिलने में संकोच नहीं किया। सम्‍मान समारोह में पुरस्कृत हिन्‍दी और मराठी के दोनों कवियों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि एक तरफ जहाँ संदीप की कविताओं में ग्राम्य परिवेश  खुलकर सामने आता है, वहीं दूसरी तरफ़ अंचित की कविताओं में शहर  की चकाचौंध दिखती है। और ये दोनों ही चीजें आपको केदार जी की कविताओं में आसानी से मिलती है। उन्होंने प्रतिभागियों के चयन का जिक्र करते हुए बताया कि हमारी भाषा का सौभाग्य है कि सभी प्रतिभागी इस सम्मान के बराबर हकदार थे। उन्होंने आगे बताया कि कवि को किसान की तरह होना चाहिए निरन्तर अपने काम में रत, कवि का जितना सम्बंध निरन्तरता से है उतना ही सबन्ध विनम्रता से है। उन्होंने बड़े ही अफ़सोस के साथ कहा कि लोग कवियों के विचलन को याद रखते हैं परन्तु उनके संघर्षो को कोई नहीं पूछता।

अरूणकमल के वक्‍तव्‍य के उपरांत हिंदी कवि अंचित जी को स्मृति चिन्ह और सम्मान राशि प्रदान की गयी। अंचित ने अपने वक्तव्य में पटना के बाद बनारस को अपना सर्वप्रिय शहर बताया। उन्होंने अपने जीवन के निजी पलों का जिक्र करते हुए बताया कि केदार ऐसे कवि हैं जो सबके अपने लगते हैं। आगे उन्होंने अपनी कुछ कविताएँ जैसे “देहमोह”, “पटना के लिए” का पाठ किया।

गुजराती भाषा के जाने-माने साहित्यकार एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सीतांशु यशश्चंद्र ने अपने वक्तव्य में कई महत्‍वपूर्ण विचार व्‍यक्‍त किए। बनारस के महत्‍व पर बोलते हुए उन्‍होनें कहा कि बनारस के नाम से ही अनेकता का बोध होता है। बहुलता का उल्लास और एहसास यहाँ की साँसों में हैं। ” भारत के दूर दूर के क्षेत्रों हिन्‍दी भाषा ट्रेन या एयरोप्‍लेन में बैठकर नहीं, अपने दो पैरों पर चलकर पहुंची है।” दोनों सम्मानित कवियों की कवितायेँ विस्थापन का चित्र रेखांकित करती हैं। आगे उन्होंने नरसी मेहता का जिक्र करते हुए बताया कि रासलीला देखते-देखते नरसी मेहता को पता ही नहीं चला कि कब मशाल जलकर खत्म हुई और हाथ जलकर रोशन हुआ। यह वही मशाल है जिसको लेकर हमारे साहित्यकार युगों-युगों से लिए चल रहे हैं। साहित्‍य वह मशाल है जिसको थामें उनका हाथ भी जलता है। यह स्वयं का जलना ही कवि को कविता का वरदान देता है। यह जल जाने का हठ कुछ ही कवियों में होता है और केदार जी उनमें से एक थे, बिल्कुल हठीले। कवि को उसके हाथ में कोई मशाल तब तक नहीं सुहाती जब तक उसका हाथ नहीं जल रहा हो।

प्रथम सत्र के अंत में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे ए अरविंदाक्षन जी ने अपने भाषण में संम्मानित कवियों को बधाई एवं उनके भविष्य के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि केदार जी को उनका पहला पुरस्कार हिंदी भाषा से इतर मलयालम भाषा में ही मिला था। यह पुरस्कार इस बात का द्योतक है कि केदार जी भाषा की सीमा को लाँघ चुके थे। वे भारत के कोने-कोने में पढ़े गए। उन्होंने कहा कि इन दोनों युवा कवियों की दुःख, पीड़ा, तड़प और कसक को पहचानने की कला ही इन्हें केदार जी के करीब लाती हैं।

प्रथम सत्र का अंत राम सुधार जी के द्वारा दिये गए धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। इसके बाद द्वितीय सत्र का प्रारंभ हिंदी की सुप्रसिद्ध पत्रिका साखी के 35 वें अंक के लोकार्पण ( श्री सितांशु यशश्चंद्र के द्वारा ) के साथ हुआ।

जलपान के उपरान्त द्वितीय सत्र का आरम्भ हुआ जिसमें आमंत्रित कवियों ने काव्यपाठ किया । काव्‍य पाठ के लिए आमंत्रित कवियों के नाम निम्न है:-

 

  • श्री ज्ञानेन्द्रपति (अध्यक्षता)
  • श्री सीतांशु यशशचंद्र ( गुजराती कवि )
  • श्री चंद्रकांत पाटिल ( कवि-आलोचक, मराठी)
  • श्री अरुण कमल (हिंदी, पटना)
  • श्री मदन कश्यप (हिंदी, दिल्ली)
  • श्री नरेन्द्र पुण्डरीक ( हिंदी,बाँदा)
  • श्री स्वप्निल श्रीवास्तव (हिंदी फैज़ाबाद)
  • श्री महेश आलोक (हिंदी शिकोहाबाद)
  • श्री पंकज चतुर्वेदी (हिंदी कानपुर)
  • श्रीमति रंजीता सिंह (हिंदी, दिल्ली)
  • श्री सुभाष राय (हिंदी लखनऊ)
  • श्री निशांत ( हिंदी कोलकाता)
  • श्री बृजराज सिंह (हिंदी आगरा)
  • श्रीमती वंदना शाही (हिंदी आगरा)

 

आखिर में तीसरे सत्र- सांस्‍कृतिक संध्‍या-   का आयोजन हुआ । इस सत्र का संचालन मशहूर कवि तथा रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल जी ने किया।  कार्यक्रम की शुरुआत में ताना बाना बैंड  द्वारा रैदास तथा कबीर के गीतों की प्रस्तुति ने पूरे  हॉल को झूमने पर मज़बूर कर दिया।  नई पीढ़ी को अपने पुरखों के गीतों से इस तरह जुड़ते देखना बेहद सुखद था। इसके बाद .रेवती साकलकर जी ने  केदार जी के गीतों की सांगीतिक प्रस्तुति दी। केदार जी के गीतों का यह शायद पहला और अविस्मरणीय संगीतिकरण था। उनके सुर लहरियों ने कार्यक्रम में मौजूद हर व्यक्ति के हृदय को सुर सागर में डुबो दिया। इसके साथ ही कार्यक्रम का समापन हुआ।  इन  अविस्मरणीय स्मृतियों को साथ लिए सभी जल मार्ग से वापस अस्सी की और लौट पड़े।

इस तरह वाराणसी के सांस्कृतिक एवं साहित्यिक वातावरण में प्रथम केदारनाथ कविता सम्मान समारोह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

 

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