प्रेमचन्द साहित्य संस्थान
आलेख

‘ कफ़न ’ कहानी : एक पाठ

उद्देश्यः प्रस्तुत इकाई में आप प्रेमचन्द की कफन कहानी का अध्ययन करेंगे। कफन प्रेमचन्द की ही नहीं हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में एक है। कफन एक बहुस्तरीय कहानी है, जिसमें घीसू और माधव की बेबसी, अमानवीयता और निकम्मेपन के बहाने सामन्ती औपनिवेशिक गठजोड़ के दौर की सामाजिक आर्थिक संरचना और उसके अमानवीय /नृशंस रूप का पता मिलता है। कफन एक ऐसे प्रतीक की तरह उभरता है जो कर्मकाण्डवादी व्यवस्था और सामन्ती औपनिवेशिक गठजोड़ के लिए कफन तैयार करता है

इस इकाई को पढ़ने के बाद आप-
– प्रेमचन्द युगीन समाज में सामन्ती औपनिवेशिक गठजोड़ की छाया में बनी उस समाजार्थिक संरचना को समझ सकेंगे जो अपने मूल चरित्र में मानव विरोधी है।
– आदर्श और यथार्थ से आगे बढ़कर कफन की उस फैंटेसी का मर्म समझ सकेंगे जो यथास्थिति के बरक्स एक नये समाज की संरचना के सूत्र देती है।
– कफन कहानी के कौशल की बारीकियों को समझ सकेंगे।
– कहानी में मौजूद दलित सन्दर्भ और उसकी व्यापकता को समझ सकेंगे।
प्रस्तावनाः
भारत वर्ष कहानियों का देश रहा है। पंचतन्त्र, कथा सरित्सागर से लेकर जातक कथाओं तक की पूरी परम्परा रही है। किस्सागोई हमारे समाज में लगातार मौजूद रही है।
साहित्यिक विधा के रूप में कहानी का विकास आधुनिक घटना है। अंग्रेजी में उपलब्ध योरोपीय कथा साहित्य से हिन्दी कहानी के विकास की प्रेरणा मिली। हिन्दी में आरम्भिक कहानियाँ प्रायः रूमानी, कोरी कल्पना पर आधारित और उपदेशपरक थीं। प्रेमचन्द हिन्दी कहानी को उसकी वास्तविक जमीन पर ले गये। प्रेमचन्द के आगमन के बाद हिन्दी कहानी को उसका वास्तविक प्रकृति और परिवेश हासिल हुआ।
कथ्य के स्तर पर ही नहीं भाषा के स्तर पर भी यह परिवर्तन दिखाई पड़ता है। प्रेमचन्द उर्दू से हिन्दी में आये थे। उर्दू गद्य काफी विकसित स्थिति में था। प्रेमचन्द के साथ गद्य का सहज और प्रवहमान रूप हिन्दी कहानी में आया। प्रेमचन्द सूक्ष्म दृष्टि विषय वैविध्य और समर्थ भाषा के प्रयोग से हिन्दी कहानी को काफी उचाई पर ले गये।
प्रेमचन्द ने ढ़ाई सौ के करीब कहानियाँ लिखीं हैं। प्रेमचन्द के कहानी लेखन को चार चरणों में देख सकते हैं। 1907 से 1911 के दौर में उनकी आरम्भिक दौर की कहानियाँ हैं। जिसमें ऐतिहासिक घटनाओं, शौर्य एवं प्रेम गाथाओं और किंवदत्तियों पर आधारित कहानियाँ हैं। दूसरे चरण 1912 से 1918 में प्रेमचन्द के व्यापक होते सामाजिक सरोकार, विषय वैविध्य एवं शिल्पगत उत्कृष्ठता का विकास दिखाई देता है। तीसरे चरण में 1919 से 1929 की कहानियाँ आती हैं जिनमें प्रेमचन्द पर गांधी और उनके विचारों का गहरा प्रभाव दिखाई पड़ता है।
चैथे चरण 1930 से 1936 की कहानियों में भारतीय समाज के आर्थिक, समाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं की तीखी समालोचना दिखाई पड़ती है। कफन कहानी का सम्बन्ध इसी चैथे चरण से है। यह कहानी प्रेमचन्द ने मृत्यु के कुछ समय पूर्व 1936 में लिखी थी।
इस दौर में राजनीति के मंच पर अम्बेडकर आ चुके थे। गांधी के साथ उनकी तीखी बहस चल रही थी। गांधी के प्रति अपनी सारी श्रद्धा के बावजूद प्रेमचन्द तक अम्बेडकर के तर्क पहुँच रहे थे। वर्ण व्यवस्था और उसके पाखण्ड की आलोचना से प्रेमचन्द सहमत थे। अम्बेडकर का मानना था कि वर्ण व्यवस्था की बुनियाद ही गड़बड़ है इसलिए नये समाज के लिए वर्ण व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती है, जबकि गांधी वर्णव्यवस्था में सुधार की गुंजाइश देख रहे थे। इस बहस में प्रेमचन्द अम्बेडकर से सहमत थे। यही कारण है कि प्रेमचन्द ने इस दौर के लेखन में वर्ण व्यवस्था और उसके पाखण्ड पर खुला हमला कर दिया। परिणाम स्वरूप प्रेमचन्द को वर्ण व्यवस्था के हिमायती वर्ग का तीखा विरोध झेलना पड़ा। प्रेमचन्द को घृणा का प्रचारक कहा गया। सदगति, दूध का दाम, ठाकुर का कुँआ आदि ऐसी ही कहानियाँ है। पर कफन इस मामले में भिन्न कहानी है कि वह एक ओर समाज संरचना की उन खामियों को उजागर करती है जिनके आधार आर्थिक हैं तो दूसरी ओर यह कहानी वर्ण व्यवस्था के मूलाधार संस्कारों पर चोट करती है।
कफन घीसू और माधव की कहानी है। माधव की पत्नी बुधिया भीतर प्रसव वेदना से छटपटा रही है। और बाहर घीसू और माधव अलाव के पास बैठे भुने हुए आलू खाने में लगे है। उधर बुधिया असहय पीड़ा से चीख रही है इधर बाप-बेटा ठाकुर के यहाँ की दावत याद कर रहे है। इधर वे आलू खाकर अलाव के निकट ही सो जाते हैं उधर छटपटाती हुई बुधिया की मृत्यु हो जाती है। सुबह बुधिया की मौत पर दोनो रोना पीटना शुरू करते हैं। कुनबे के लोग जुटते हैं, अन्तिम संस्कार की तैयारी होने लगती है। घीसू माधव कफन आदि की व्यवस्था के लिए निकलते हैं। जमींदार से दो रुपये मिलने के बाद घीसू गाँव भर घूम कर पाँच रुपये से कुछ ज्यादा रकम जुटा लेता है। इधर कुनबे के लोग बाकी इन्तजाम में लगे हैं उधर बाप-बेटा कफन के लिए शहर जाते हैं। दो चार जगह कफन देखने के बाद दोनों शराब की दूकान पर पहुँचते हैं। जी भर कर शराब पीते हैं, दावत उड़ाते हैं, बचा हुआ खाना भिखारी को दान देते है और फिर नशे में मस्त होकर निर्गुण गाते हैं और निढाल होकर गिर पड़ते हैं। कहानी यहीं खत्म हो जाती है।
कहानी पढ़ने पर सबसे पहली बात जिस पर ध्यान जाती है वह है घीसू और माधव की अमानवीयता। बुधिया, जिसने इस खानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बेगैरतों का दोजख भरती रहती थी- के प्रति दोनो बाप बेटा अमानवीयता की हद तक बेपरवाह हैं। उधर वह दर्द से छटपटा रही है और इन दोनो को भुने हुए आलू की पड़ी हुई है।
कहानी कुल तीन खण्डों में है। पहले खण्ड में प्रेमचन्द ने अपने इन चरित्र नायकों का चित्र खींचा है। प्रेमचन्द स्वयं बताते हैं कि विचित्र था जीवन इनका। यह विचित्रता तीन बातों पर निर्भर थी। पहली बात यह कि दोनों परले दरजे के कामचोर थे। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव आया उघाते काम करता तो घण्टे भर चीलम पीता।
दूसरी बात कि दोनों में संतोष और धैर्य, संयम और नियम की पराकाष्ठा है। प्रेमचन्द लिखते हैं अगर दोनों साधु होते, तो उन्हें सन्तोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिल्कुल जरूरत न थी। यह तो इनकी प्रकृति थी।…घर में मिट्टी के दो चार बर्तन के सिवा कोई सम्पत्ति नहीं फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता  को ढांके हुए  जिये जाते थे।’
तीसरी बात यह है कि दोनों पात्र विचारशील हैं वे मेहनत करने वाले अपने साथ के लोगों का हश्र देख रहे थे। ‘इसलिए घीसू किसानों के विचार शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठक बाजों की उत्सित मण्डली में जा मिला था।’
यानी जिस समाज में हाड़तोड़ मेहनत करने वाले भूखों मरने को विवश हों और आराम तलब लोगा उनकी मेहनत के बूते मौज उड़ा रहे हों वहाँ घीसू का यह कदम एक विचारशील कदम है।
‘आलू खाकर दोनो ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पांव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलिया मारे पड़े हों।’
यहाँ तक आते-आते हमारे चरित्र नायक संत कवि मलूक दास जी याद दिलाते हैं-
अजगर करै न चाकरी, पंक्षी करै न काम।
दास मलूका कह गये सबके दाता राम।।
ऐसा लगता है कि घीसू सच्चे अर्थों में मलूकदास का चेला हैै। घीसू माधो दोनों की बेपरवाही इसी कोटि की है। कहानी में कम से कम दो वाकये इसकी पुष्टि करते हैं। माधव के यह कहने पर कि बुधिया को कहीं बाल बच्चा हुआ तो क्या होगा ? घर में तो कुछ है ही नहीं। इस पर घीसू कहता है- ‘सब कुछ आ जायेगा। भगवान दें तो! इसी तरह माधव के यह पूछने पर कि कफन का इन्तजाम होगा कैसे घीसू परम आश्वस्ति के साथ कहता है- यही लोग देंगे। हो सकता है पैसे न दें कफन ही ले आयें। यह आसदगी ही घीसू और माधो की कामचोरी और निकम्मेपन को सन्तों वाली इस दार्शनिक ऊंचाई तक ले जाती है।
प्रेमचन्द के दोनों विचित्र पात्र कामचोर हैं, निस्पृह हैं, बेपरवाह हैं पर विचारशील हैं। उनकी कामचोरी, निस्पृहता और बेपरवाही का सम्बन्ध उनकी विचारशीलता से है। उनकी यह विचित्रता विचार पूर्वक अर्जित की गई विचित्रता है।
सामाजिक संरचना ऐसी है कि ‘किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठना जानते थे, कहीं ज्यादा सम्पन्न थे।‘ किसान और मजदूर की हालत इस कदर खस्ता केवल उसकी आर्थिक स्थिति के नाते नहीं बल्कि उसकी वर्गीय स्थिति के नाते है। किसान में ‘दुर्बलताएँ’ हैं। शोषक वर्ग न केवल इन दुर्बलताओं को जानता है बल्कि इन दुर्बलताओं से फायदा उठाना भी जानता है। कफन कहानी में ही नहीं अपने समूचे लेखन में प्रेमचन्द इन दुर्बलताओं के खिलाफ संघर्ष करते लड़ते दिखाई पड़ते हैं।
घीसू माधो में चाहे जितना नाकारापन हो कम से कम वे दुर्बलताएँ नहीं है जिनका बेजाँ फायदा उठाया जा सके । उल्टे घीसू को शोषक शार्षक वर्ग की दुर्बलताओं की पहचान है और उनकी दुर्बलताओं से फायदा उठाने की समझ। सारी बदहाली फटेहाली के बावजूद घीसू अगर बेपरवाह दिखता है तो अपने इसी खासियत के चलते। शोषक वर्ग की दुर्बलताओं की समझ उसकी बेपरवाही के मूल में है।
प्रेमचन्द लिखते हैं- ‘मगर इन दोनों को (मजदूरी के लिए) उसी वक्त  बुलाते जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी सन्तोष कर लेने के सिवा कोई चारा न होता।’ आमतौर पर शासक या जमीदार वर्ग के समाने किसान-मजदूर जिस तरह बेबस होते हैं घीसू माधों के सामने जमीदार/शासक समूहों के लोग उसी तरह बेबस हैं। जाहिर है उस समय न तो काम के घण्टे तय थे और न ही न्यूनतम मजदूरी का कोई सिद्धान्त था। मजदूरी भी मनमानी थी और काम के घण्ट भी मनमाने ढंग से तय होते थे। घीसू माधों के आस-पास न तो काम के घण्टे और न्यूनतम मजदूरी जैसी कोई बात थी और न ही कोई आन्दोलन। लेकिन घीसू-माधो ने अपनी हिकमत (और हिम्मत) से ऐसा तरीका ईजाद कर लिया था जिसमें वे अधिकतम काम और न्यूनतम मजदूरी के प्रचलित व्यवहार की जगह न्यूनतम मजदूरी के लिए न्यूनतम काम की शर्त को जाने अनजाने मनवा रहे थे। ‘बुधिया के आने के बाद से तो इस बात को लेकर घीसू माधव में एक अकड़ आ गयी थी और वे निव्र्याज  भाव से दुगनी मजदूरी मागने लगे थे।’ संभव है उन्हें इसमें भी सफलता मिल गयी हो। इसके अलावा वे फटेहाल चाहे जितने हों खुद मुख्तार तो थे ही। अपने बाकी भाई बन्धुओं की तरह कोल्हू के बैल की तरह जुत तो नहीं रहे थे। यह सब इसलिए संभव हुआ कि उनके भीतर वे दुर्बलताएँ नहीं थी जिनके आधार पर प्रभुवर्ग उनका शोषण कर सके।
सवा सेर गेहूँ कहानी के शंकर के जीवन की सारी त्रासदी के मूल में उसकी वे दुर्बलताएँ हैं जिन्हें पुरोहित वर्ग ने कहीं बहुत गहरे उसकी चेतना में रोप दिया है। घीसू और माधो की चेतना उन सभी पौरोहिती और वर्ण व्यवस्था जनित मान्यताओं को अस्वीकार कर देती है। प्रभुवर्ग की मान्यताओं का आत्मसातीकरण दलित समुदाय के दुखों के मूल में है। घीसू की चेतना इस अर्थ में विकसित है कि वह आत्मसातीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनता। प्रेमचन्द की कोशिश है कि किसान मजदूर स्त्री दलित इस आत्मसातीकरण की प्रक्रिया से बाहर आयें। वे इसका हिस्सा बनने की बजाय इस प्रक्रिया से बाहर निकले और इसे रोक दें। इसके बगैर सच्ची मुक्ति की बात बेमानी है।दलित आक्षेप और कफन

साहित्य का उद्देश्य निबन्ध में प्रेमचन्द सौन्दर्य का मेयार बदलने की बात करते हैं। वे सौन्दर्य की खोज में विशिष्ट की अपेक्षा साधारण की ओर जाने का प्रस्ताव करते हैंै। प्रेमचन्द साहित्य को जीवन की आलोचना कहते हैं।  तो इसका अर्थ यह है कि जीवन में सुन्दर की खोज की जाय और असुन्दर को पहचान कर उसका निरीक्षण किया जाय। दलित जीवन की त्रासदी और अस्पृश्यता की समस्या के मूल में समाज में प्रभुत्व प्राप्त वर्णाश्रमी मूल्य ही हैं। प्रेमचन्द इस तथ्य को अच्छी तरह समझते हैं। इसलिए प्रेमचन्द वर्णाश्रमी मूल्यों-संस्कारों पर कुठाराघात करते हैं। दलित जीवन पर प्रेमचन्द का लेखन दरअस्ल वर्णाश्रमी मूल्यों-संस्कारों की समीक्षा ही है। गांधी मानते थे कि वर्ण व्यवस्था अपने आदर्श रूप में ठीक रही होगी। जरूरत इसकी विकृतियों को दूर करने की है। जबकि अम्बेडकर का मानना था कि सनातनी हिन्दू व्यवस्था के मूल में ही गड़बड़ी है इसलिए इसे पूरी तरह बदल देना जरुरी है। प्रेमचन्द का दलित जीवन पर केन्द्रित लेखन प्रमाणित करता है।कि वे वैचारिक रूप से अम्बेडकर के साथ खड़े हैं। इसीलिए वे सतानती हिन्दू समाज में आमूलचूल परिवर्तन की कोशिश करते दिखाई पड़ते हैं। दलित जीवन पर केन्द्रित प्रेमचन्द का लेखन इसी कोशिश का हिस्सा है। कफन कहानी भी इसी कोशिश में शामिल है। कफन कहानी के मुख्य पात्रों का सम्बन्ध दलित जाति से है और ये पात्र बेहद अमानवीय, निष्ठुर, निकम्मे मानवीय सदगुणों से पुरी तरह रहित आदि दिखते हैं- इसलिए दलित चिन्तकों को आपत्ति है। प्रसिद्ध कथाकार ओमप्रकाश बाल्मिकी ने सबसे पहले कहानी के दलित विरोध रूप को चिन्हित किया था।

ओमप्रकाश बाल्मीकि की मुख्यतः दो आपत्तियाँ हैं बुधिया को अकेले मर जाने देना और दलित पात्रों को निकम्मा और कामचोर चित्रित करके दलितों के बारे में चली आयी सवर्ण धारण को प्रतिष्ठित करना। बुधिया की मृत्यु सचमुच स्वाभाविक लगती है। यह सवाल उठाया जाता है कि बुधिया के मरने के बाद कुनबे के लोग खास तौर से औरतें आती हैं वे उस समय क्यों नहीं आते जब बुधिया दर्द से चीख चिल्ला रही थी और छटपटा रही थी। कहानी के आरम्भ में ही बुधिया की मौत हो जाती है। कहानी के पहले खण्ड में प्रेमचन्द अपने पात्रों का चरित्र चित्रण करने में मशगूल हैं। तड़पति हुई बुधिया के तड़प के बरक्स घीसू-माधव का  विभिन्न चरित्र उभरता है। वे आलू खाकर पानी पीकर धोती ओढ़कर सो जाते हैं उधर बुधिया की कराह जारी है। पूरी रात का घटना क्रम अनकहा रह गया है। बुधिया के ठण्डे पड़ जाने की सूचना के साथ भोर होती है। प्रेमचन्द यह भी बताते हैं  कि उसके पेट का बच्चा मर गया है। पूरी कहानी बुधिया की मृत्यु पर टिकी है। मृत्यु आकस्मिकता होती है। प्रेमचन्द अपनी कहानियों में मृत्यु की आकस्मिक का प्रयोग एक टेकनीक के रूप में करते हैं। गोदान में गाय और मातादीन और झुनिया के बेटे की मृत्यु हो या सदगति में दुखी की या फिर दूध का दाम कहानी में गूदड़ और भूंगी की। प्रेमचन्द गूदड़ और भूंगी की मृत्यु का महज उल्लेख करके आगे बढ़ जाते हैं। इसके बाद वे कहानी के नायक मंगल का तफसील से वर्णन करते हैं। गूदड़ और भूंगी के मृत्यू के बाद ही मंगल निरीहता की जीती जागती मूर्ति बन जाती है। यह इन्तिहां ही मंगल को वह ताकत देती है जो खेल के समय सुरेश बाबू और उनके साथियों की सारी हिकमत को ध्वस्त कर देती है। कफन में बुधिया की मृत्यु इतनी अकास्मिक है कि पाठक उसे सूचना की तरह लेता है और आगे बढ़ जाता है। तड़पती और दर्द से कराहती बुधिया के पास कुनबे के लोग नहीं आते हैं, यह अस्वाभाविक तो है पर असंभव नहीं है। देर शाम जब घीसू और माधो आलू खाने में लगे थे- कुनबे के लोग गहरी नींद में हो सकते थे। आलू खाने के लोभ में घीसू माधो बुधिया को देखने भीतर तो जा नहीं रहे हैं वे अगल-बगल किसी को बुलाने क्या जायेंगे। कुनबे के लोग यदि आ ही गये होते तो  क्या फर्क पड़ जाता। जच्चे और बच्चे की मृत्यु को उस साधनहीनता में टाला नहीं जा सकता था। इसलिए इसी आधार पर कहानी को खारिज करना या प्रेमचन्द को कठघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। इससे प्रेमचन्द न तो कुनबे के लोगों की असंवेदनशीलता उजागर कर रहे हैं और हीं ऐसा उजागर होता है। अगले दिन कुनबे के लोग ही हैं जो जुटते हैं और घीसू माधो के निकल जाने के बाद बुधिया के लाश की देख-भाल करते हैं। इसलिए सब कुछ कहानी की मांग के अनुरूप होता है।
जहाँ तक घीसू और माधव के निकम्मेपन से समूचे दलित  समाज को निकम्मा और कमचोर समझे जाने की बात है। प्रेमचन्द स्वयं अपने इन चरित्रों को ‘विचित्र कहते हैं। वे विचित्र इसलिए हैं कि जब कुनबे के लोग हाड़ तोड़ मेहनत करके भी अधनंगे और भूखे रहने पर मजबूर हैं। वहाँ इनका निकम्पापन और कमचोरी इनकी विचारशीलता का प्रमाण है। प्रेमचन्द ने कहानी में विचारशीलता और कर्मशीलता के दो स्पष्ट विभाजन किये हैं। प्रेमचन्द उस कुत्सित मण्डली को विचारशील पाते हैं तो तीन तिकड़म करके भोले-भाले मेहनत कश लोगों को छलने और लूटने में लगे हैं।
रात को आलू उखाड़ने मक्का तोड़ने यहाँ तक की गन्ना तोड़कर खा जाने की घटनायें होती रहीं हैं। पेट भरने के दो चार रुपये का आलू उखाड़ लेने वाला घटिया  और निकृष्ट करार दिया जाता है जबकि लाखों-करोड़ों का वारान्यारा करने वाले सम्मान की दृष्टि से देखे जाते  हैं। कफन कहानी इस विडम्बना की ओर भी हमारा ध्यान आकृष्ट करती है।
ओम प्रकाश बाल्मीकि अपनी एक कविता में कहते हैं-

कुंआ ठाकुर का
पानी ठाकुर का
खेत खलिहान ठाकुर के
गली मुहल्ले ठाकुर के
फिर अपना क्या
गाँव/ शहर/ देश

इसे पढ़ते ही प्रमचन्द की कहानी का कुंआ की ये पंक्तियाँ याद आती हैं-

‘‘ ब्राह्मण देवता आशीर्वाद देंगे, ठाकुर लाठी मारेंगे, साहूजी एक के पाँच लेंगे। गरीबी का दर्द कौन समझता है। हम तो मर भी जाते हैं तो कोई दुआर पर झाँकने नहीं आता, कंधा देना तो बड़ी बात है। ऐसे लोग कँए से पानी भरने देंगे।
कहने की जरूरत नहीं कि ओम प्रकाश बाल्मीकि ने अपनी कविता में ‘ठाकुर का कुंआ’ के प्रतीक का उपयोग करते हैं। ठाकुर  का कुँआ सामन्ती सत्ता का प्रतीक है जिसे चुनौती देने का साहस गंगी करती है। ओम प्रकश बाल्मीकि इस प्रतीक की व्याख्या करते हैं। कुँआ ही नहीं खेत खलिहान गल्ली मुहल्ले सब ठाकुर के हैं, यह यथास्थिति का बयान मात्र है। कविता जब यह सवाल करती है- फिर अपना क्या तब वह यथास्थिति पर प्रश्न चिन्ह लगाती है। ‘ठाकुर का कुँआ’ के प्रतिक को कवि ओमप्रकाश बाल्मीकि समझते हैं और उसे अपने ढंग से रचनात्मक विस्तार देते हैं। पर विमर्शकार ओमप्रकाश बाल्मीकि कफन के प्रतीक को समझने के बजाय ऐसी चीजों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं जहाँ से उनके विमर्शकार को तर्क मिलते हैं। ओमप्रकाश बाल्मीकि ठीक कहते हैं कि प्रेमचन्द को देवता बना दिया गया है। प्रमचन्द को देवता बनाना जितना गलत है उतना ही गलत है उनसे देवता जैसी पूर्णता की मांग करना। प्रेमचन्द मनुष्य थे। उनसे भी चूक हुई है। किसी तकनीकी चूक के आधार पर कहानी के मूल मन्तव्य को नकार देना कहाँ की समझदारी है। ‘लाश उठते उठते रात हो जाएगी’ इस वाक्य के आधर पर प्रेमचन्द के कुछ सवर्ण आलोचकों ने सवाल उठाया हैं कि रात में कहाँ उठती है? प्रेमचन्द को इस सच्चाई का ज्ञान नहीं था इसलिए पूरी कहानी रद्दी की टोकरी में टाल दी जाय। अरे भाई बेबी टब के गन्दे पानी को फेंकिए पर बेबी को तो बचा लिजिए। कथन के बहाने कहानी वर्णवादी संस्कारों पर सवाल उठाती है, सामंती औपनिवेशिक गठजोड़ से पैदा हुए समाज की विकृति पर सवाल उठाती है। महज कुछ तकनिकी बातों के आधार पर इन सवालों को गलफत करना दरअस्ल उसी वर्णवाद को मजबूत करना है।
कफन कहानी का सम्बन्ध अन्तिम संस्कार से है। बुधिया के अन्तिम संस्कार के लिए घीसू और माधव निकलते हैं। सारे ताम झाम के बाद भी कहानी में अन्तिम संस्कार नहीं हो पाता। कफन कहानी यहाँ गोदान उपन्यास से जुड़ती हैं। अन्तिम संस्कार का मामला वहाँ भी है। उपन्यास में गोदान कर्मकाण्ड के लिए धनिया की घृणा के स्वर तक पहुँची हुई विरक्ति देखने लायक है। कफन कहानी में यह जिम्मेदारी घीसू और माधो के कन्धे पर आती है। गोदान में धार्मिक सामाजिक आर्थिक शोषण तन्त्र के खिलाफ जूझते हुए होरी की मृत्यु होती है। जूझने की इस यात्रा में धनिया होरी के साथ है। वह देखती है कि मूल्यों मान्यताओं के साथ ताल मेल बिठाकार चलने वाले होरी महतो का क्या हश्र होता है। कदम कदम पर संघर्ष के बाद भी जीवन का यह हाल होता है। गोदान जैसा कर्मकाण्ड भी उसी शोषण तन्त्र की रचना है जिसका शिकार होरी बनता है। इसलिए धनिया का मन वितृष्णा से भर उठता है और वह यही है उनका गोदान कह कर गोदान के प्रति अपनी वितृष्णा को व्यक्त करती है। ठाकुर का कुंआ कहानी की गंगी का याद आती है। उसका दिल रिवाजी पाबन्दियां के खिलाफ विद्रोह से भर गया। दरअस्ल यह लेखक प्रेमचन्द का हदय है जो रिवाजी पाबन्दियों के खिलाफ विद्रोह से भर गया है। सवा सेर गेहूँ कहानी में शंकर की यातना के मूल में उसके वर्णवादी सोच के दायरे में विकसित  उसके अपने विचार ही है। ब्राहमण देवता ने शंकर के साथ जो धूर्तता की उसके पीछे कोई कानूनी दावा नहीं था।
उनका बल वर्णवादी सोच द्वारा फैलायी गयी कर्मफल, पुनर्जन्म लोक परलोक जैसी धारणायें थीं जो शंकर को बाँधे हुए थीं। दलित जीवन की दुर्दशा के मूल में ऐसी धारणायें काम कर रही थीं। वर्ण व्यवस्था के तंत्र का जिस तरह आत्मसातीकरण पूरे समाज में हुआ है प्रेमचन्द की नजर वहाँ है। जिस धीसू और माधो को निकम्मा और कामचोर समझा जाता है जरा देखें की अगर शंकर की जगह धीसू होता तो क्या सवा सेर गेहूँ कहानी की परिणति वही होती या कुछ अलग होती। ब्राह्मण देवता धीसू की वह दुर्गत कभी न कर पाते जो उन्होंने शंकर की हुई। प्रेमचन्द शंकर जैसे चरित्रों की सरलता और निरीहता देख रहे थे जिसका बेजा फायदा ब्राह्मण देवता उठा रहे थे। धीसू और माधो और जो भी हों ऐसे सरल और निरीह नहीं हैं। यहाँ थोड़ा ठहर कर सरलता और निरीहता पर विचार कर लें। सरलता और निरिहता विद्रोह का हथियार बन जाती है। वैसे देखें तो धीसू और माधो जैसी सरलता कहाँ मिलेगी। पेट भरने की जुगत हो जाय उसके बाद उन्हें कुछ संग्रह करना है न कोई तीन पाँच करना है। बस पेट भर जाय। यह तो सरलता की इन्तिहा है। निरीह इतने हैं कि मरणासन्न बुधिया के लिए कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं है। जमींदार सेठ साहूकार को छोडि़ए उसके अपने कुनबे के लोग भी उसकी खोजखबर नहीं ले रहे है।
तन पर कपड़े नहीं, पेट भर भोजन नहीं, कोई पोरसाहाल नहीं अब इससे ज्यादा निरीहता क्या हेागी। पर दर्द का हद से गुजरना ही दवा होना है। धीसू और माधो अपनी सरलता और निरीहता को ही अपना औंजार बना लेते हैं। धीसू और माधो प्रेमचन्द द्वारा रचे खास तरह के विद्रोही चरित्र है। पर उनका विद्रोह उनसे हमें दिखाई नहीं देता । पर अस्ल हम विद्रोह की एक खासमुद्रा से परिमित होते हैं जबतक विद्रोह की खास मुद्रा दिखाई नहीं देती हम विद्रोह केा देख ही नहीं पाते।
घीसू माधो का रोम रोम रिवाजी पाबन्दियों और वर्णवादी बन्दिशों से विद्रोह करता है। यह विद्रोह उनके जीवन भरके आचरण व्यवहार में दिखाई पड़ता है। अन्त में वे बुधिया का अन्तिम संस्कार नहीं करते। कफन के पैसे से दारु पी जाते हैं। दारु पीने के बाद घीसू और माधो एक बहुत बड़े प्रश्न से टकराता है- ‘कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने केा चिथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफन चाहिए।’
यू0 आर0 अनन्तमूर्ति के संस्कार उपन्यास में भी अन्तिम संस्कार के लिए, नागरप्पा की लाश पड़ी है।उधर प्राणेशाचार्य पोथियों म,ें फिर हनुमान मन्दिर में समस्या का हल खोजते हैं और इधर दलित बस्ती के लोग अपने ढंग से अन्तिम संस्कार कर डालते हैं। उसके बाद प्राणेशाचार्य पूरे उपन्यास में अपने बा्रह्मण के संस्कारों से मुक्ति के लिए भटकते हैं।
यहाँ कफन को लेकर, अन्तिम संस्कार को लेकर घीसू माधो में जो संवाद होता है, वह वृहत्तर समाज को ब्राह्मणत्व के संस्कारों से मुक्त करने वाले है। जीते जी भोजन न मिले, वस्त्र न मिले, सम्मान न मिले- मरने के बाद बैकुण्ठ जाने की चिन्ता खाये रहती है। बैकुण्ठ का टिकट अन्तिम संस्कार के समय ब्रह्मण देवता को दिये जाने वाले दान से मिलता है। यहाँ घीसू माधो मयखाने में बैठकर छक कर पीते हैं, भर पेट खाते हैं, अघाते हैं और बची हुई पूरिया भिखारी को दान देते हैं – बैकुण्ठ में बुधिया का स्थान सुरक्षित कर देते हैं। विश्वामित्र ने त्रिशंकु को जीते जी स्वर्ग भेजने का प्रयास करके स्वर्ग और नर्क का मायाजाल रचने वालों की सत्ता को चुनौती दी थी।
यहाँ घीसू माधो बिना अन्तिम संस्कार का पाखण्ड किये बुधिया को सीधे बैकुण्ठ भेज रहे हैं। यह जन्म से लेकर मृत्यु तक समूचे  जीवन को संस्कारों में बाँध कर जीअतो खइहैं मुअतो खइहैं का विधान रचने वाले ब्राह्मणवाद को चुनौती देते हैं।
‘कफन’ 1936 में प्रकाशित हुई। कहने की जरुरत नहीं कि इस समय प्रमचंद अपने वैचाारिक और कलात्मक शीर्ष पर पहुंच चुके थे।  उनकी वैचारिक ऊंचाई का उदाहरण मृत्यु के कुछ माह पूर्व लिखा गया ‘महाजनी सभ्यता’ शीर्षक लेख है, जिसमें वे पूँजीवाद का खुला विरोध करते हैं और नृशंस अमानुषिक पँूजीवाद के विनाश के प्रति आश्वस्त हैं। कलात्मक ऊचाई का एक उदाहरण स्वयं ‘कफन’ कहानी है।
‘कफन’ तक आते- आते प्रेमचन्द की कला इतनी परिपक्व हो गयी थी। उनके विचार या कलात्मक अभिप्राय लेखक प्रेमचन्द पर हावी नहीं होते थे। यथार्थवादी कहानियों में स्वयं या किसी पात्र से कहलवा देते थे, इसलिए प्रेमचन्द की आरंभिक रचनाशीलता की इस प्रवृत्ति से अभ्यस्त पाठक कफन में ऐसा प्रकट विचार न पाकर इस कहानी की मनचाही व्याख्या करते हैं।
इसी वजह से ‘कफन’ को गहरे यथार्थ बोध की कहानी के रूप में पढा गया तो बहुत दिनों तक ‘डिह्यूमनाइजेशन’ की कहानी के रूप में पढने का प्रस्ताव किया। इधर दलित उभार के साथ ‘कफन’ को दलित विरोधी कहानी के रूप पढा जा रहा है। इसे भी कहानी की कलात्मक ऊँचाई का प्रमाण माना चाहिए। दलित विचारकों का आरोप है कि घीसू- माधव जैसे  संवेदनहीन पात्र यथार्थ में नहीं हो सकते, इसलिए प्रेमचंद ने अपनी सवर्ण दृष्टि के नाते जानबूझकर दलितों को अपमापित करने के लिए ऐसे बैगेरत पात्रों की सृष्टि की है। फिलहाल इस बहस में जाने की आवश्यकता नही है कि ऐसे पात्र हो सकते हैं या नहीं। यह तथ्य है कि प्रेमचन्द ने ‘कफन’ कहानी लिखी है और उसमें धीसू माधव जैसे चरित्र रचे हैं। देखना यह है कि इन पात्रों की कहानी वास्तव में क्या कहती है? क्या यह वास्तव में दलित विरोधी कहानी है?
कफन को ‘डिह्यूमनाईजेशन’ की कहानी बताते हुए कहा गया कि निर्मम सामन्ती व्यवस्था मनुष्य को कैसे अमानवीय बना देती है। यह अर्थ किया गया कि प्रमचंद यह दिखाना चाहते हैं कि घीसू और माधव जिस व्यवस्था के उत्पाद थे, वह कितनी गर्हित है। इसमे एक अन्तर्निहित सन्देश है कि ऐसी व्यवस्था जो बदल देना चाहिए आदि।
वस्तुतः अपने अभिप्राय में यह एक बहुस्तरीय कहानी कहानी है, इसलिए इसके पात्र धीसू- माधव का चरित्र भी बहुस्तरीय है। एक घीसू- माधव है जो जाति के चमार हैं, भूमिहीन हैं, मजदूर हैं, वे देख रहे हैं कि जी तोड़ मेहनत करने वाले भी ढंग से नही जी पा रहे हैं, उनके लिए पेट भरना भी मुहाल है। इसलिए वे निकम्मे और कामचोर हैं। निकम्मापन और कामचोरी उनका चरित्र नही है। उनकी हिकमत है। शोषण से बचने का उपाय है। जाहिर है उस समय दलित आन्दोलन नही था, असंगठित मजदरों- भूमिहीन किसानेां के शोषण से बचाने संघषर््ा नही कर पाते। उनके भीतर एक विद्रोह चेतना है जो कामचोरी के रूप में, निकम्मेपन के रूप में प्रकट होती है। जाने- अनजाने वे उतने ही काम के लिए दोगुनी मजदूरी लेने में सफल होते हैं जितने के लिए साधारणतः एक व्यक्ति को मिलती थी। न्यूनतम मजदूरी का न कोई विधान था, न आन्दोलन। अधिकतम काम और अल्पतम के लिए अल्पतम काम के अघोषित नारे पर चलने वाला संघर्ष था।
दूसरे घीसू माधव वे हैं वे हैं जो दर्द से छटपटाती बुधिया से बेपवरवाह आलू खा रहे हैं। वे बेपरवाह अमानवीयता के नाते नहीं, असहायता के नाते थे। बेपरवाह होने को विवश थे। पूरी तरह निहंग। जब ओझा भी देखने के लिए एक रुपया मांग रहा हो और जेब में फूटी कौड़ी न हो तो ‘बेपरवाह’  होने के अलावा उनके पास चारा भी क्या था? प्रेमचंद लिखते हैं- ‘‘हम तो कहेंगे घीसू किसानों से कहीं ज्यादा विचारवान था और किसानो के विचारशून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठक बाजों की कुत्सित गण्डली में जा मिला था।’’ इसलिए उनका जन्म भ्ले ही दलित वर्ग में हुआ हो उनका चरित्र दलित नहीं है। बैठकबाजों की कुत्सित मण्डली का चरित्र है। इसीलिए इन दोनों का आलू खाना पृष्ठभूमि में बुधिया का दर्द से छटपटाना एक दृश्य भर नही है। एक रूपक भी है। अपने श्रम  से समाज का पेट भरने वाला हिस्सा दर्द से छटपटा रहा है और बैठकबाजों की मण्डली के सदस्य इससे बेपरवाह माल उड़ा रहे हैं।
तीसरे घीसू, माधव वे हैं जो पैसे मिलने पर कफन खरीदने की जगह शराब की दुकान पर पहँच जाते हैं। जमकर पीते है,जी भर खाते है और अघाते हैं। इस दौरान बुधिया लगातार इनके जेहन में उपस्थित है। वे इस पर लानत भेजते हैंकि जीते जी यही रुपये मिल जाते तो दवा दारु करके उसे बचा लिया जाता। मरने के बाद समाज कफन देने केा तैयार है, जीत जी दवा देने को नही। वे बुधिया की मेहनत याद करते हैं और उसके प्रति श्रद्धावान होते हैं। भगवान से उसके लिए सीधे बैकुण्ठ में स्थान सुरक्षित कराते हैं। उनमें जबरदस्त किस्म का अपराध बोध और कर्तव्यबोध का मिश्रित भाव जगता है। उसके ठीक बाद दुःख और निराशा का दौर आ जाता है। माधव कहता है- ‘मगर दादा! बेचारी ने बड़ा दुःख भेागा। कितना दुःख झेलकर मरी।’ ध्यान रहे यह वही माधव है, जो थेाड़ी देकर पहले आलू के चक्कर में दर्द से तड़पड़ाती बुधिया के पास तक नहीं गया और उसके कफन के पैसे की शराब पी गया। अब कातर होकर रोता है। उसका पिता दार्शनिक अन्दाज मे समझाता है कि खुश हो बेटा  िकवह इतनी जल्दी मायाजाल से मुक्त हो गयी। दःख की इसी दशा में वे गाने लगते है-‘ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी!’ दुःख का चरमोत्कर्ष कबीर के इस निर्गण में जाकर विलीन हो जाता है।
निर्गुण की रोशनी में ‘ठगनी क्यों नैना झमकावेः’ ठगनी! गाने के बाद वे गिर पड़ते हैं यहीं से एक बार इस कहानी का रीप्ले देखा जाए। हम पायेंगे कि कबीर का निर्गुण पूरी कहानी को नये सिरे से आलोकित करता है। इस आलोक में घीसू का बिल्कुल नया रूप दिखाई देता है। निकम्मे, कामचोर, संवेदनहीन और पियक्कड़ घीसू की आत्मा में कबीर की झलक बिजली की तरह चमक उठती है। अभाव और दुःख घीसू को उस भूमि पर ले जाता है, जहाँ से कबीर को माया और मायाजन्य विषमता का अभिज्ञान हुआ था। कबीर की माया शंकराचार्य की माया नहीं है और न ही कबीर का रहस्यवाद किसी दार्शनिक चिन्तन का परिणाम। कबीर का रहस्यवाद मायाजन्य विषमता का जवाब था। बुधिया की माया से ‘मुक्ति’ और ‘बैकुण्ठ गमन’ इस रहस्यवाद का ठेठ रूपान्तरण है। घीसू माधव के पास ‘माया’ नही है। माया के मारे हुए हैं। माया अपनी आँखे नचा रही है, प्रलोभन दे रही है। पास नहीं आती। पर घीसू और  माधव उस दशा में पहुँचे हुए हैं जहाँ दर्द इस हद से गुजरा है कि दवा हो गया है! वे अब माया की धौंस में नहीं है। उलटे माया को धौंस दिखा रहे हैं। दिखा रहे हैं कि वे माया के बावजूद जिन्दा हैं, वे खुश हो सकते हैं, गा सकते हैं, नाच सकते हैं, झूम सकते हैं। उनके आगे माया का कोई वश नही है। माया न उनका कुछ बिगाड़ सकती है, न उनकी बुधिया का, क्योंकि वे यहाँ मधुशाला में है और बुधिया वहाँ बैकुण्ठ में। बुधिया के प्रति बरती गई बेपरवाही के भीतर छुपा गहरा लगाव औश्र दुःख यहाँ प्रकट हो रहा है।
रीप्लें को आगे बढाये और घीसू के कुछ वक्तव्यों पर गौर करें। घीसू कहता है- ‘‘वह न बैकुण्ठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जायेंगे जो गरीब को दोनो हाथों से लूटते हैं और अपने पाप धोने के लिए गंगा में नहाने हैं और मन्दिर में जल चढाते हैं?’’
थोड़ा और आगे बढने पर घीसू और माधव का यह संवाद मिलता है, ‘कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने का चिथड़ा भी न मिला, उसे मरने पर नया कफन चाहिए।’
कफन लाश के साथ जल ही तो जाता है? ‘और क्या रखा रहता है?’ यही पाँच रुपये मिलते तो दवा दारू करा लेते।
घीसू के इन कथनों को ध्यान से पढे़, जिनमें कबीर की अनुगूंज सुनाई देती है। क्या इन कथनों में सामन्तवाद से ग्रस्त, संकीर्ण हिन्दू धर्म की रुढियों के प्रति विद्रोह नहीं है? यही नही, घीसू के यहाँ विकृत पूँजीवाद के प्रति विद्रोह का भाव भी दिखता है। नौजवानी में ठाकुर के बारात की भेाज की याद करते हुए कहता है, ‘‘अब कोई क्या खिलाएगा? वह जमाना दूसरा था। अब तो सब को किफायत सूझती है।शादी ब्याह में मत खर्च करो। पूछो, गरीब का माल बटोर- बटोर कर कहाँ रखेागे? बटोरने मे तो कमी नहीं है। हाँ खर्च में किफायत सूझती है’’।
घीसू के पास समाज की पहचान थी। शोषण पर उसकी नजर थी। शोषण के विरुद्ध संघर्ष का उसका अपना तरीका था। अब इसमें प्रेमचंद का क्या दोष कि उनके समय तक समाज (पूर्वी उत्तर प्रदेश) के घीसू- माधव का आँसू पोछने कबीर पहुँचे हुए थे, अम्बेडकर नहीं। इसलिए ‘कफन’ को आरोपित करने का अर्थ कबीर को आरोपित करना भी हो सकता है। अस्तु, लेखक की जाति देखकर मूल्यांकन करने की हड़बड़ी के बजाय उसकी रचना का सतर्क पाठ – पुनर्पाठ करके मूल्य निर्णय करना बेहतर होगा। यदि अम्बेडकर ने ऐसी हड़बड़ी की होती तो उन्हें बौद्ध धर्म की अच्छाइयाँ समझ में न आतीं।
दलित जन- उभार के इस दौर में जब अम्बेडकर घीसू- माधव के वंशजों तक पहुँच रहे हैं, उनकी जीवन स्थितियाँ बदल रहे हैं, ‘कफन’ विरोध सिद्ध करने का हठयोग करने के बजाय नई जीवन स्थितियों  पर अच्छी कहानियाँ लिखी जानी चाहिए। इन परिवर्तनों पर राजनीतिकों की नजर है। इसके पहले कि वे इस प्रक्रिया को राजनीतिक फसल तक सीमित कर दें, दलित और गैरदलित लेखकों को इस परिवर्तन पर नजर रखनी चाहिए ताकि देश की दलित- शोषित जनता के लिए ‘परिवर्तन’ छलावा न सिद्ध हो, बल्कि उसका जीवन सचमुच परिवर्तन हो।

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